Shimoga National Park

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Shimoga Monkey National Park

Shimoga Monkey National Park

Shivmoga  Monkey National Park ( Man – Animal Conflict – Ecology)

(GS PAPER 1 and 3 : भूगोल एवं पर्यावरण एवं पारिस्थितिकी)

1- चर्चा में क्यों

2- उल्लेखनीय तथ्य

3- सम्बन्धित क्षेत्र का भूगोल

4- क्यासनुर फॉरेस्ट रोग

5- कर्नाटक के वन्य जीव अभयारण्य एवम् राष्ट्रीय उद्यान

6– मानव – वन्य जीव संघर्ष

7- चुनौतिया

8- आगे की राह

9- निष्कर्ष

10- कर्नाटक का भूगोल (मानचित्र के साथ पढ़ें)

      1)- कर्नाटक राज्य

      2)- पश्चिमी घाट

      3)- कर्नाटक के पर्वत

      4)- पठार

      5)- नदियां

      6)- झीलें

      7)- मिट्टी

      8)- जलविद्युत परियोजनाएं

      9)- फसलें

     10)-  खनिज

      11)- बहु उद्देशीय परियोजनाएं

चर्चा में क्यों ?

कर्नाटक के शिमोगा जिले में राज्य सरकार द्वारा एक बंदर पार्क स्थापित किए जाने की घोषणा की गई थी। जिसका स्थानीय स्तर पर अत्यधिक विरोध किया जा रहा है।

उल्लेखनीय तथ्य :

  • यह पार्क शरावती नदी पर स्थित जलविद्युत परियोजना लिंगानमकी में स्थित छोटे द्वीपों में से एक पर स्थापित किए जाने का सरकार का लक्ष्य है।
  • इस पार्क को स्थापित करने के पीछे सरकार की मंशा बंदरों एवम् मानवों के बीच संघर्ष है।
  • कर्नाटक के इस जिले में बंदरों के कारण फसलों आदि कीअत्यधिक हानि होती है।
  • स्थानीय लोगों द्वारा इस पार्क का विरोध इसलिए किया जा रहा है क्योंकि जिस स्थान पर यह पार्क स्थापित किया जाने वाला है वह स्थान मानवीय अधिवास से 500 मी की ही दूरी पर हैं
  • कर्नाटक राज्य में क्यानासुर फॉरेस्ट रोग का अत्यधिक प्रभाव देखा जाता है जो कि बंदरों के कारण होता हैं स्थानीय लोगों को इस पार्क के स्थापित होने से इस रोग के फैलने का भय हैं
  • इसके अतिरिक्त पर्यावरणविदों द्वारा भी इस पार्क का विरोध किया जा रहा है क्योंकि यह बिना किसी भी शोध के स्थापित किया जाएगा जिससे ये बंदर नयी जगह पर जाकर वाहन के इकोसिस्टम में सेंध लगा सकते हैं और पूरे इकोसिस्टम का संतुलन बिगड़ा सकते है ।

क्यासनूर फॉरेस्ट डिजीज (KFD) Kyasanur Forest Disease (KFD) : 

जिसे आमतौर पर ‘Monkey Fever’ के रूप में जाना जाता है, एक टिक-जनित जूनोटिक बीमारी है जो भारत में पहली बार 1957 में शिवमोग्गा जिले में रिपोर्ट की गई थी। इसके बाद यह राज्य के अन्य हिस्सों और कर्नाटक के बाहर फैल गई

संबंधित क्षेत्र का भूगोल :

1- शिमोगा (Shimoga) भारत के कर्नाटक राज्य के शिमोगा ज़िले में स्थित एक नगर है। यह उस ज़िले का मुख्यालय भी है। नगर का आधिकारिक नाम शिवमोग्गा है। नगर तुंगा नदी के किनारे स्थित है। यह नगर पश्चिमी घाट के पर्वतीय क्षेत्र का प्रवेशद्वार है। यह नगर समुद्रतल से 569 मीटर की ऊँचाई पर है।

इस जिले में कई प्रपात पाए जाते हैं-

1- जोग जल प्रपात

2- डब्बे प्रपात (सागर)

3- कुंचीकल धबधबा

4- बरकाना फॉल्स

इसमें से सबसे महत्वपूर्ण है जोग प्रपात –

जोग जल प्रपात –

  • जोग प्रपात कर्नाटक में शरावती नदी पर है। यह चार छोटे-छोटे प्रपातों – राजा, राकेट, रोरर और दाम ब्लाचें – से मिलकर बना है।
  • इसकी ऊंचाई 253 मी हैं तथा इसका दूसरा नाम गोरसेप्पा प्रपात भी है ।
  • यह प्रपात कर्नाटक तथा महाराष्ट्र राज्यों की सीमा पर शिवमोगा जिले के प्रधान केंद्र से कुछ किमी दूर स्थित है।इस स्थान पर महाराष्ट्र तथा कर्नाटक दोनों राज्यों द्वारा जलशक्ति से विद्युत उत्पादन के बड़े बड़े संयंत्र स्थापित किए गए हैं।

शरावती  नदी –

  • शारावती का उद्गम भारत के कर्नाटक राज्य में है और इसी राज्य में बहती हुई यह इसी राज्य में समाप्त हो जाती है। यह नदी भारत की गिनी चुनी नदियों में से है जो पश्चिम की तरफ बहतीं हैं।
  • इस नदी का अधिकांश भाग पश्चिमी घाट में है। प्रसिद्ध जोग जलप्रपात इसी नदी के द्वारा निर्मित है। यह नदी तथा इसके आस-पास का क्षेत्र जैवविविधता की दृष्टि से बहुत समृद्ध है।
  • दक्षिण भारत में बहने वाली शरावती नदी पश्चिमी घाट से निकलने वाली प्रमुख नदियों में से एक है. यह कर्नाटक राज्य की एक मुख्य नदी है, जिसका उद्गम राज्य के शिमोगा में अम्बुतीर्थ नामक स्थान से माना जाता है.
  • शरावती नदी की लम्बाई करीब 128 कि.मी. है. यह नदी कर्नाटक के विभिन्न जिलों में बहती हुई अरब सागर में विलीन हो जाती है.

जल प्रपात व विद्युत परियोजना :

इसके अलावा नदी पर बनी शरावती जलविद्युत परियोजना तीन इकाइयों (शरावती विद्युत गृह, लिंगानमकी व गेरसोप्पा जल विद्युत परियोजना) में विभाजित है. यह नदी कर्नाटक में विद्युत आपूर्ति के साथ ही सिंचाई के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है.

कर्नाटक के वन्य जीव अभ्यारण –

1- भद्रा

2- कावेरी

3- ब्रम्हगीरी

4- दंदेली

5- पुष्पगिरी

6- मेलकोटे टेंपल

7- दारोजी स्लॉथ बीयर अभयारण्य

8- बिलिगिरिरंगा वन्यजीव अभयारण्य

9- रानिबेन्नूर ब्लैकबक अभयारण्य

10- शरावती वैली वन्यजीव अभयारण्य

11- शेट्टीहल्ली वन्यजीव अभयारण्य

12- तलकावेरी वन्यजीव अभयारण्य

राष्ट्रीय पार्क (National Parks) :

1- बांदीपुर

2- भद्रा

3- तुंगभद्रा

4- सोमेश्वर

5- बन्नेरघट्टा बायोलॉजिकल पार्क

6- नागरहोले नेशनल पार्क एंड टाइगर रिज़र्व

7- अंशी नेशनल पार्क

8- ग्रेटर तलाकाउवेरी नेशनल पार्क

9- पूमाले रिज़र्व फॉरेस्ट

10- कुरिन्जल पीक, कुद्रेमुख रेंज

11- अगुम्बे रिज़र्व फॉरेस्ट

12- राजीव गाँधी नेशनल पार्क

13- कुद्रेमुख नेशनल पार्क

14- मूकाम्बिका वाइल्डलाइफ सैंक्चुरी कोदाचादरी

15- हत्तिबैल पार्क, कोद्थाल्ली

16- टीपू सुलतान नेशनल पार्क

17- अगुम्बे रिज़र्व फॉरेस्ट

18- मुदुमलाई नेशनल पार्क

मानव – वन्य जीव संघर्ष :

मानव एवम् वन्य जीवों के बीच संघर्ष वर्तमान समय में सामान्य बात हो गई है। इसका प्रमुख कारण मानवीय गतिविधियां ही हैं जैसे की –

  • वन्य जीवों के आवास में कमी आना
  • मानवीय जनसंख्या वृद्धि
  • मानवीय अधिवास में वृद्धि
  • कारखाने एवम् औद्योगिक गतिविधियों में वृद्धि
  • जगलों को नुकसान एवम् उनका कटाव
  • वन्य जीवों के मूलभूत स्वभाव में परिवर्तन आना जैसे कि बंदरों एवम् अन्य जानवरों का मानवीय कृषि उत्पादों को खाना।

ये सारी गतिविधियां प्रमुख हैं जिन्होंने सम्पूर्ण इकोसिस्टम का संतुलन बिगड़ा दिया है और मानव तथा वन्य जीवो के बीच संघर्ष को जन्म दिया है। यहां कुछ राज्यों के हाल ही के आंकड़ों को बताया गया है जो इस समस्या की भयावहता को बताते हैं।

1- जम्मू – कश्मीर की चिनाब घाटी अब मानव वन्य जीव संघर्ष गंभीर समस्या के रूप में उभर रहा है। जंगलों में मानव बस्ती के विस्तार और वनों के अंधाधुंध कटान की वजह से हजारों की आबादी डर के साए में जीने को मजबूर है। कोविड-19 के लॉकडाउन के बाद हिमालयन काला भालू और लैपर्ड की मानव बस्तियों में आवाजाही से साफ निष्कर्ष निकला है कि मानव आबादी ने जंगली जानवरों को मुश्किल में डाला है। 2010 से 2018 तक इस घाटी में वन्य जीवों के हमले के 343 मामलों में 34 लोगों की मौत जबकि 309 लोग जख्मी हुए थे।

जम्मू रीजन की चिनाब घाटी के 808 गांवों में से 565 गांवों मानव वन्य जीव संघर्ष के प्रभावों के अलावा 2017 से 2018 व 2019 में मानव वन्य जीव संघर्ष में मृतक, घायलों के साथ ही वन्यजीव पीडि़तों के मामलों का अध्ययन किया है। 11691 वर्ग किमी क्षेत्रफल की इस घाटी का 5555 वर्ग किमी क्षेत्रफल वनों से घिरा है। सात लाख की आबादी की इस घाटी में इस संकट से तीन लाख से अधिक लोग प्रभावित हैं। इस क्षेत्र में अक्सर मानव वन्य जीव संघर्ष के मामले आते रहे हैं।

2- मानव – वन्यजीव संघर्ष को रोकना उत्तराखंड वन विभाग के लिए बड़ी चुनौती है। पूरा राज्य जंगली जानवरों के हमले से प्रभावित है। गढ़वाल में गुलदारों का आतंक है तो कुमाऊं के रामनगर-हल्द्वानी बेल्ट में जंगली हाथियों के हमले बढ़ रहे हैं। राज्य में वर्ष 2017-18 में बाघ, तेंदुए और अन्य वन्यजीवों के हमले में कुल 85 लोग मारे गए। इसकी एवज में राज्य सरकार ने 130.90 लाख रुपये बतौर मुआवज़ा दिए।

चुनौतियां :

  • इस समस्या की सबसे बड़ी जड़ हैं मानवीय जनसंख्या में वृद्धि। और उसके कारण मानवीय गतिविधियों में वृद्धि
  • मानवीय गतिविधियों में इतनी अधिक वृद्धि हो गई है कि यह जंगली जानवरो के अधिवास क्षेत्र को अपना निशाना बनाने लगी हैं।
  • पर्वतीय राज्यो में पर्यटन के नाम पर अंधाधुंध तरीके से होटल रेस्टोरेंट का निर्माण तथा विकाश के नाम मर बिना उचित शोध किए सड़कों का निर्माण किया जाना।
  • भूकंप ज़ोन में होते हुए भी उत्तराखंड एवम् सम्बन्धित राज्यो में अत्यधिक निर्माण कार्य कियांजा रहा है जिससे जगली जीवो को रहने के लिए एवम्।विचरण कर लिए स्थान नहीं मिलता
  • विद्युत् उत्पादन हेतु नदियों पर बड़े पैमाने पर जलविद्युत परियोजना का निर्माण किया जाता हैं जिससे डाउन स्ट्रीम पर छोटे छोटे जलाशय एवम् अन्य सहायक नदियों में जल की उपलब्धता कम हो जाती हैं जिससे उनके निर्भर रहने वाले जीव जंतुओं को पानी की तलाश में मानवीय क्षेत्रों में आना पड़ता है
  • हाथियों के पारंपरिक गलियारे तकरीबन समाप्त हो चुके हैं। जंगल से सटे खेत वन्य जीवों को आकर्षित करते हैं। उसपर जंगल के बीच अक्सर पिकनिक मनाने गए पर्यटक वन्य जीवों की दिनचर्या में खलल डालने से बाज नहीं आते। इससे वन्य जीवों के व्यवहार में भी परिवर्तन आ रहा है।
  • कुल मिलाकर इस संघर्ष के कारण में मानवीय कारण ज्यादा प्रमुख हैं मानव द्वारा की जंगली जीवो के प्राकृतिक वातावरण में सेंध लगाई गई है।

आगे की राह : 

  • संघर्ष की मूल वजह तो सर्वविदित है। सिमटते जंगल, प्रवास स्थल व भोजन की कमी और जंगलों में बढ़ते मानवीय हस्तक्षेप से यह नौबत आई है।
  • इतने सारे मामलों के बावजूद वन विभाग सक्रिय नजर नहीं आता। वन विभाग ने कुछ स्थानों पर आबादी के पास वाले क्षेत्रों में फेंसिंग कराई, लेकिन देखरेख के अभाव में यह तारबाड़ जगह-जगह क्षतिग्रस्त हो चुकी है।
  • पहाड़ी क्षेत्रों में तो यह भी संभव नहीं कि तारबाड़ की जाए, जबकि सर्वाधिक प्रभावित इलाके पहाड़ ही हैं।
  • हम उस स्थान के भूगोल से तारतम्य बैठाते हुए नीति नियंताओं को इस समस्या का समाधान तलाशना होगा।
  • आखिर पारिस्थितिकीय तंत्र को बचाने के लिए वन्य जीवों को बचाना दायित्व है तो इंसान की जिंदगी भी मूल्यवान है।
  • इसमें कोई दो राय नहीं कि यदि अब न संभले तो आने वाला समय और भयावह होगा। तब स्थितियां नियंत्रण से बाहर हो चुकी होंगी।
  • हम अपना दृष्टिकोण परिवर्तित करना होगा तथा वन्यजीवों के प्रति रिएक्टिव होने की जगह हम प्रो-एक्टिव बन सकते हैं।
  • अलग-अलग क्षेत्रों में अलग-अलग प्रजाति के जानवरों के व्यवहार को समझना होगा।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष की बढ़ती घटनाओं को आपदा में शामिल करने की मांग भी उठती रही है।
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम के लिए लोगों को जागरुक करना भी बेहद जरूरी है।

निष्कर्ष :

मानव बस्ती के विस्तार और अंधाधुंध वनों की कटाई की वजह से यह समस्या विकराल रूप ले रही है। कोरोना संक्रमण की रोकथाम को प्रभावी लॉकडाउन के बाद हिमालयन काला भालू और लैपर्ड दिनदहाड़े मानव बस्तियों में घूमते देखे गए हैं, जो इसका सबूत है कि मानव आबादी ने जंगली जानवरों के जीवन जीने के तरीकों पर अवरोध पैदा किया है। हमें इस समस्या पर गंभीरता से मंथन करना होगा।

जंगली जीव मानवीय बस्ती में नहीं बल्कि मानव वन्य जीवों के अधिवास में घुसा है उसने प्रकृति संतुलन को बिगाड़ा हैं। हाल ही में केरल में हथिनी की विस्फोटक खाने से हुई मृत्यु इस बात को जाहिर करती हैं कि हम चाहकर भी इस तथ्य को नकर नहीं सकते कि यह संघर्ष आने वाले दिनों में बढ़ने वाला है यदि मानवीय गतिविधियों को रोका ना गया तो.. एक सभ्य मानव के रूप में हम यह सत्य मान लेना चाहिए कि प्रथ्वी सिर्फ हमारी नहीं नहीं बल्कि वन्य जीवो की भी उतनी ही हैं तथा प्रत्येक संसाधन पर उनका भी अधिक्र है चाहे वह जल हो या भोजन । हमे इस संतुलन को बनाए रखना होगा ताकि प्रथ्वी को एक ग्रह के रूप में हम अधिक समय तक समावेशित रख सके।

कर्नाटक का भूगोल ( मानचित्र के साथ पढ़ें) : राज्य विशेष श्रंखला (PRELIMS FACTS)

कर्नाटक राज्य

  • कर्नाटक राज्य जिसे कर्णाटक भी कहते हैं, दक्षिण भारत का एक राज्य है। इस राज्य का सृजन 1 नवंबर, 1956 को राज्य पुनर्संगठन अधिनियम के अधीन किया गया था। मूलतः यह मैसूर राज्य कहलाता था और 1973 में इसे पुनर्नामकरण कर कर्नाटक नाम मिला था।
  • कर्नाटक की सीमाएं पश्चिम में अरब सागर, उत्तर पश्चिम में गोआ, उत्तर में महाराष्ट्र, पूर्व में आंध्र प्रदेश, दक्षिण-पूर्व में तमिल नाडु एवं दक्षिण में केरल से लगती हैं।
  • राज्य की आधिकारिक और सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है कन्नड़।

कर्नाटक राज्य में तीन प्रधान मंडल हैं:

  1. तटीय क्षेत्र करावली,
  2. पहाड़ी क्षेत्र मलनाड जिसमें पश्चिमी घाट आते हैं, तथा
  3. तीसरा बयालुसीमी क्षेत्र जहां दक्षिण पठार का क्षेत्र है।
  • राज्य का अधिकांश क्षेत्र बयालुसीमी में आता है और इसका उत्तरी क्षेत्र भारत का सबसे बड़ा शुष्क क्षेत्र है।
  • कर्नाटक का सबसे ऊंचा स्थल चिकमंगलूर जिला का मुल्लयनगिरि पर्वत है। यहां की समुद्र सतह से ऊंचाई 1,929 मीटर है।

कर्नाटक के पर्वत :

कर्नाटक में कई छोटी बड़ी पर्वत श्रेणियां हैं जिनकी उत्पत्ति मुख्य रूप से पश्चिमी घाट से ही हुई है। अर्थात इन सभी पर्वत श्रेणियों की पैतृक श्रेणी पश्चिमी घाट ही हैं।

पश्चिमी घाट :  

  • भारत के पश्चिमी तट पर स्थित पर्वत श्रृंखला को पश्चिमी घाट या सह्याद्रि कहते हैं। दक्‍कन पठार के पश्चिमी किनारे के साथ-साथ यह पर्वतीय श्रृंखला उत्‍तर से दक्षिण की तरफ 1600 किलोमीटर लम्‍बी है।
  • विश्‍व में जैविकीय विवधता के लिए यह बहुत महत्‍वपूर्ण है और इस दृष्टि से विश्‍व में इसका 8वां स्थान है। यह गुजरात और महाराष्ट्र की सीमा से शुरू होती हैऔर महाराष्ट्र, गोवा, कर्नाटक, तमिलनाडु तथा केरल से होते हुए कन्याकुमारी में समाप्‍त हो जाती है।
  • वर्ष 2012 में यूनेस्को ने पश्चिमी घाट क्षेत्र के 39 स्‍थानों को विश्व धरोहर स्‍थल घोषित किया है।
  • यह पर्वत श्रंखला हिमालय पर्वत से भी प्राचीन है और भारत में मानसून की वर्षा को प्रभावित करती है| इसकी सबसे ऊंची चोटी अनाइमुडी है और पश्चिमी घाट की औसत ऊंचाई लगभग 900 मी. है|
  • यह पर्वत एक वास्तविक पर्वत नहीं, बल्कि प्राय:द्वीप पठार का अपरदित खड़ा कगार है। इसके उत्तरी भाग में बेसाल्ट चट्टानें पाई जाती हैं।
  • यह पर्वतश्रेणी महाराष्ट्र में कुंदाइबारी दर्रे से आरंभ होकर, तट के समांतर, दक्षिण की ओर जाती है।
  • यह श्रेणी कोंकण के निम्न प्रदेश एवं दकन के पठार को एक दूसरे से विभक्त करती है।
  • अंत में दक्षिण में यह श्रेणी पूर्वी घाट पहाड़ से नीलगिरि के पठार के रूप में मिल जाती है। इसी पठार पर पहाड़ी सैरगाह उटकमंड स्थित है.
  • नीलगिरि पठार के दक्षिण में प्रसिद्ध दर्रा पालघाट है। यह दर्रा 24 किमी चौड़ा तथा सगरतल से 1000 फुट ऊँचा है। केरल-मद्रास का संबंध इसी दर्रे से है। इस दर्रे के दक्षिण में यह श्रेणी पुन: ऊँची हाकर अन्नाईमलाई पहाड़ी के रूप में चलती है। पाल घाट के दक्षिण में श्रेणी की पूर्वी पश्चिमी दोनों ढालें खड़ी हैं।
  • भूगर्भीय स्रोतों के अनुसार लगभग 150 मिलियन वर्ष पहले गोंडवाना के महाद्वीप के टूटने के दौरान इसका गठन हुआ था। यहां क्रोनोलाइट्स, ग्रेनाइट गनीस, खोंडालाइट्स, लेप्टाइनाइट्स, क्रिस्टलीय चूना पत्थर, लौह अयस्क, डोलराइट्स और एनर्थोसाइट्स की अलग-अलग घटनाओं के साथ मेटामोर्फिक नीस चट्टान मिलती है । दक्षिणी पहाड़ियों में बॉक्साइट अयस्क भी पाए जाते हैं

प्रमुख दर्रे- (PRELIMS FACTS)

थाल घाट : नाशिक—मुंबई

भोर घाट : मुंबई—पुणे

पाल घाट : कोच्चि—चेन्नई मार्ग

सेनकोट्टा दर्रा : तिरुअनंतपुरम—मदुरै मार्ग।

जैव विविधता :

  • इन पहाड़ियों का कुल क्षेत्र 160,000 वर्ग किलोमीटर है। इसकी औसत उंचाई लगभग 1200 मीटर है।इस क्षेत्र में फूलों की पांच हजार से ज्‍यादा प्रजातियां, 139 स्‍तनपायी प्रजातियां, 508 चिडि़यों की प्रजातियां और 179 उभयचर प्रजातियां पाई जाती हैं।
  • पश्चिमी घाट में कम से कम 84 उभयचर प्रजातियां और 16 चिडि़यों की प्रजातियां और सात स्‍तनपायी और 1600 फूलों की प्रजातियां पाई जाती हैं, जो विश्‍व में और कहीं नहीं हैं।पश्चिमी घाट में सरकार द्वारा घोषित कई संरक्षित क्षेत्र हैं।
  • इनमें दो जैव संरक्षित क्षेत्र और 13 राष्ट्रीय उद्यान हैं।पश्चिमी घाट में स्थित नीलागिरी बायोस्फियर रिजर्व का क्षेत्र 5500 वर्ग किलोमीटर है, जहां सदा हरे-भरे रहने वाले और मैदानी पेड़ों के वन मौजूद हैं।
  • केरल का साइलेंट वैली राष्‍ट्रीय पार्क, पश्चिमी घाट का हिस्‍सा है। यह भारत का ऐसा अंतिम उष्‍णकटिबंधीय हरित वन है, जहां अभी तक किसी ने प्रवेश नहीं किया है।
  • अगस्‍त, 2011 में पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ समूह ने पूरे पश्चिमी घाट को पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्र घोषित किया है।

कर्नाटक की स्थानीय पहाड़ियां –

1- अम्बुतीर्थ (Ambuthirtha) – भारत के कर्नाटक राज्य के शिमोगा ज़िले में स्थित पश्चिमी घाट का एक पर्वत है। यह पहाड़ शरावती नदी का नदी स्रोत है ।

2- कुदरेमुख – जिसे कई बार कुदुरेमुख भी कहा जाता है, कर्नाटक राज्य के चिकमंगलूर जिला में एक पर्वतमाला है। यहीं निकटस्थ ही के एक कस्बे का नाम भी यही है। यहां दक्षिण भारत की तीन नदियों का उद्गम है: तुंग, भद्रा एवं नेत्रवती।

3- गंगामूला(Gangamoola) – भारत के कर्नाटक राज्य के चिकमगलूर ज़िले में स्थित एक पर्वत है। यह पश्चिमी घाट की पर्वतमाला का सदस्य है और तुंगा नदी व भद्रा नदी का मूल स्रोत होने के लिए प्रसिद्ध है। यहीं से एक तीसरी नदी, नेत्रवती नदी, भी आरम्भ होती है। यह कुदरेमुख के समीप है। गंगामूला की ऊँचाई 1458 मीटर है।

4- बिलगिरि रंगास्वामि पर्वतमाला – जिसे बी.आर.हिल्स भी कहा जाता है, दक्षिणभारत के कर्नाटक राज्य के दक्षिण भाग में स्थित है। बिलगिरि रंगन पर्वतमाला भारत के पश्चिमी घाट की पर्वतमाला का एक पर्वत है।  इसी नाम पर यहां एक अभ्यारण भी हैं।

NOTE : शिमोगा जिला में अगुम्बे भारत में दूसरा सर्वाधिक वार्षिक औसत वर्षा पाने वाला स्थल है।

कर्नाटक के पठार –

  • कर्नाटक का पठार कर्नाटक राज्य, दक्षिण-पश्चिम भारत का क्षेत्र है। इस पठार का नामकरण ‘करनाड’, जिसका अर्थ है- “काली मिट्टी की भूमि”, के नाम पर किया गया है। कर्नाटक पठार का क्षेत्रफल लगभग 1,89,000 वर्ग कि.मी. और औसत ऊंचाई लगभग 800 मीटर है।
  • यह पठार धारवाड़ पर्वतीय प्रणाली की ज्वालामुखीय चट्टानों, रवेदार-परतदार चट्टानों और ग्रेनाइट से मिलकर बना है।
  • कर्नाटक का पठार दक्षिण में नीलगिरि पहाड़ियों में विलीन हो जाता है; दक्षिणी पहाड़ियों में 2,030 मि.मि. और उत्तरी पहाड़ियों में 711 मि.मि. तक वर्षा होती है।
  • यहां से चंदन की लकड़ी का निर्यात होता है और सागौन व यूकेलिप्टस का इस्तेमाल मुख्यत: फ़र्नीचर तथा काग़ज़ बनाने में होता है।
  • इस पठारी क्षेत्र से मैंगनीज़, क्रोमियम, तांबा और बॉक्साइट का खनन होता है। यहाँ बाबाबूदान की पहाड़ियों में लौह अयस्क और कोलार स्वर्ण क्षेत्र में सोने के विशाल भंडार हैं।

कर्नाटक की नदियां –

  • कर्नाटक की महत्त्वपूर्ण नदियों में कावेरी, तुंगभद्रा नदी, कृष्णा नदी, मलयप्रभा नदी और शरावती नदी हैं।
  • शरवती नदी पर भारत का सबसे ऊंचा जलप्रताप (253 मीटर) है, जिसे ‘जोग जलप्रपात’ कहते हैं। यह जलप्रताप देश में पनबिजली उत्पादन का अकेला विशालतम स्त्रोत और प्रमुख पर्यटक आकर्षण है।

कर्नाटक की झीलें –

  1. अय्यनकेरी झील
  2. पंपा सरोवर – विजयनगर साम्राज्य से संबंधित
  3. उन्कल झील
  4. उल्सुर झील
  5. कुक्करहल्ली झील
  6. कावेरी भिमेःश्वर

मिट्टी – यहां की मृदा को छः प्रकारों में वर्गीकृत किया जा सकता है: लाल, लेटेराईट , काली, अलुवियल (alluvial soil) एवं तटीय रेतीली मिट्टी।

कर्नाटक की फसलें –

  • ज्वार, कपास, चावल, गन्ना, तिल,मूंगफली, तम्बाकू, फल, नारियल और कॉफ़ी यहाँ की प्रमुख फ़सलें हैं। इसके अतिरिक्त यहां अंगूर की खेती भी की जाती है।
  • कर्नाटक की लगभग 56% जनसंख्या कृषि और संबंधित गतिविधियों में संलग्न है
  • तटीय मैदान में सघन खेती होती है, जहाँ प्रमुख खाद्यान्न चावल और प्रमुख नकदी गन्ना है। अन्य प्रमुख फ़सलों में ज्वार और रागी शामिल हैं।
  • अन्य नकदी फ़सलों में काजू, इलायची, सुपारी और अंगूर प्रमुख हैं। पश्चिमी घाट की ठंडी ढलानों पर कॉफी और चाय के बागान हैं।
  • पूर्वी क्षेत्र में सिंचाई के कारण गन्ने और अल्प मात्रा में रबड़, केले व संतरे जैसे फलों की खेती संभव हो सकी है।
  • पश्चिमोत्तर में मिलने वाली काली मिट्टी में कपास, तिलहन और मूंगफली की फ़सलें उगाई जाती है।
  • पश्चिम में मलनाड क्षेत्र के जंगलों में सागौन, चंदन व बांस मिलते हैं और अन्य वनोपजों में चर्मरंजक गोद लाख (गोंद के जैसा पदार्थ, जिसका उपयोग वार्विश के निर्माण में होता है) शामिल हैं।
  • अन्य वृक्षों में यूकलिप्टस और शीशम आते हैं। मैसूर नगर में चंदन के तेल का प्रसंस्करण होता है और यह राज्य की अग्रणी निर्यात सामग्री है।

औद्योगिक गतिविधि –

  • यहाँ भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के अनेक बड़े उद्योग स्थापित किए गए हैं। जैसे हिन्दुस्तान एयरोनॉटिक्स लिमिटेड, नेशनल एरोस्पेस लैबोरेटरीज़, भारत हैवी एलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड, इंडियन टेलीफोन इंडस्ट्रीज़, भारत अर्थ मूवर्स लिमिटेड एवं हिन्दुस्तान मशीन टूल्स आदि जो बंगलुरु में ही स्थित हैं।
  • यहाँ भारत के कई प्रमुख विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी अनुसंधान केन्द्र स्थित हैं। जैसे भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन, केन्द्रीय विद्युत अनुसंधान संस्थान, भारत इलेक्ट्रॉनिक्स लिमिटेड एवं केन्द्रीय खाद्य प्रौद्योगिकी अनुसंधान संस्थान।
  • मैंगलोर रिफाइनरी एंड पेट्रोकैमिकल्स लिमिटेड, मंगलोर स्थित एक तेल शोधन केन्द्र है।
  • 1970 के दशक से कर्नाटक (विशेषकर बंगलुरु) सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में विशेष उभरा है। इनमें से कई के मुख्यालय भी राज्य में ही स्थित हैं, जिनमें दो सबसे बड़ी आई.टी कंपनियां इन्फोसिस और विप्रो हैं।
  • बंगलौर को भारत की सिलिकॉन घाटी कहा जाने लगा है।
  • प्रमुख उद्योगों में वस्त्र निर्माण, खाद्य और तम्बाकू प्रसंस्करण और छपाई शामिल हैं।कर्नाटक राज्य की राजधानी बंगलोर अधिकांश औद्योगिक विकास का केंन्द्र है। ।
  • भारत में कर्नाटक जैवप्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भी अग्रणी है। यह भारत के सबसे बड़े जैव आधारित उद्योगों के समूह का केन्द्र भी है.
  • इसी राज्य से भारत के कुल पुष्प-उद्योग का75% योगदान है। पुष्प उद्योग तेजी से उभरता और फैलता उद्योग है, जिसमें विश्व भर में सजावटी पौधे और फूलों की आपूर्ति की जाती है।
  • भारत के 3500 करोड़ के रेशम उद्योग से अधिकांश भाग कर्नाटक राज्य में आधारित है, विशेषकर उत्तरी बंगलौर क्षेत्रों जैसे मुद्दनहल्ली, कनिवेनारायणपुरा एवं दोड्डबल्लपुर, जहां शहर का 70 करोड़ रेशम उद्योग का अंश स्थित है। यहां की बंगलौर सिल्क और मैसूर सिल्क विश्वप्रसिद्ध हैं।

यातायात –

  • 2003 में हुबली में मुख्यालय सहित दक्षिण पश्चिमी रेलवे के सृजन से पूर्व राज्य दक्षिणी एवं पश्चिमी रेलवे मंडलों में आता था। अब राज्य के कई भाग दक्षिण पश्चिमी मंडल में आते हैं, व शेष भाग दक्षिण रेलवे मंडल में आते हैं।
  • तटीय कर्नाटक के भाग कोंकण रेलवे नेटवर्क के अंतर्गत आता है, जिसे भारत में इस शताब्दी की सबसे बड़ी रेलवे परियोजना के रूप में देखा गया है।
  • मैंगलोर -पत्तन

खनिज –

  • कुछ स्थानों पर कर्नाटक की उच्च खनिज भंडार वाली पूर्व कैंब्रियन युग की चट्टानें हैं, जो कम से कम 57 करोड़ वर्ष पुरानी हैं।
  • कर्नाटक भारत में क्रोमाइट का सबसे बड़ा उत्पादन है; यह देश में मैग्नेसाइट उत्पादन दो राज्यों में से एक (दूसरा राज्य तमिलनाडु) है।
  • उच्च गुणवत्ता वाले लौह अयस्क भंडार मुख्यत: चिकमगलूर और चित्रदुर्ग ज़िलों में हैं;
  • अल्प मात्रा में अभ्रक ताम्र अयस्क, बॉक्साइट, रक्तमणि का भी खनन होता है।
  • भारत में सोना इस क्षेत्र में स्थित कोलार स्वर्ण क्षेत्र से निकाला जाता है। राष्ट्रीयकृत हो चुकी सोने की प्रमुख खानें 2,743 मीटर तक गहरी हैं।

जलविद्युत परियोजनाएं –

भारत मे जल का विशाल भण्डार है। इस दृष्टि से भारत का विश्व मे पांचवा स्थान है। इसकी शुरूआत 1897 ई मे दार्जिलिंग में हुयी जहां पहली बार 130 किलोवाट क्षमता का पहला जल विद्युत गृह बनाया गया।

पहली जल विद्युत परियोजना कर्नाटक राज्य में कावेरी नदीपर शिवसमुद्रम स्थान पर है।

शारावथी परियोजना

संचालक: कर्नाटक पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड

स्थान : कर्नाटक

बहुउद्देश्य परियोजनाएं –

  • अल्मट्टी बांध भारत के कर्नाटक राज्य में कृष्णा नदी पर एक जलविद्युत परियोजना है जो जुलाई 2005 में पूरी हुई थी।
  • तुंगभद्रा परियोजना- आंध्र प्रदेश और कर्नाटक सरकारों द्वारा संयुक्त उपक्रम
  • मैट्टुर परियोजना कर्नाटक एवम् तमिलनाडु की कावेरी नदी पर
  • पोचमपाद परियोजना – गोदावरी नदी
  • मालप्रभा – मालप्रभा नदी कर्नाटक
  • ऊपरी कृष्णा – कृष्णा नदी
  • घाट प्रभा – घाट प्रभा
  • भद्रा – भद्रा नदी
  • हिड़कल परियोजना – घाट प्रभा

 


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