Article 32 Indian Constitution, GS PAPER 2 : भारतीय राजव्यवस्था

Article 32 भारतीय संविधान

Article 32 भारतीय संविधान 

(GS PAPER 2 : भारतीय राजव्यवस्था)

चर्चा में क्यों ?

  • रिपब्लिक टीवी चैनल के एंकर और एडिटर अर्नब गोस्वामी के ऊपर सांप्रदायिकता को बढ़ावा देने और कांग्रेस अध्यक्षा सोनिया गांधी के लिए अभद्र भाषा का उपयोग करने के लिए दर्ज़ मामले को पुलिस से सीबीआई को सौंपे जाने की याचिका सुप्रीम कोर्ट ने खारिज़ कर दी है। उच्चतम न्यायालय के जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एमआर शाह की पीठ ने 19 मई को रिपब्लिक टीवी के एडिटर-इन-चीफ अर्णब गोस्वामी द्वारा कथित सांप्रदायिक टिप्पणी के लिए संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (क) के तहत एक पत्रकार का अधिकार बोलने और व्यक्त करने के नागरिक के अधिकार से अधिक नहीं है ,कहकर ख़ारिज कर दी। मुंबई पुलिस द्वारा दर्ज मामले की जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो को ट्रांसफर करने और एफआईआर को रद्द करने की याचिका को खारिज कर दिया है।
  • पीठ ने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत एफआईआर पर कोई सुनवाई नहीं हो सकती। याचिकाकर्ता के पास सक्षम अदालत के समक्ष उपाय अपनाने की स्वतंत्रता है। यही नहीं उच्चतम न्यायालय ने बांद्रा में मस्जिद के सामने एकत्र होने वाली भीड़ से सम्बन्धित अर्णब गोस्वामी की याचिका भी ख़ारिज कर दी है और राहत के लिए सक्षम न्यायालय में जाने को कहा है।
  • पीठ ने हालांकि 24 अप्रैल को पारित पहले के अंतरिम आदेश की पुष्टि की है, जिसमें कई एफआईआर को एक साथ कर मुंबई में ट्रांसफर किया गया था। 24 अप्रैल को दी गई अंतरिम सुरक्षा को एफआईआर के संबंध में उचित उपाय करने में सक्षम बनाने के लिए तीन और सप्ताह बढ़ा दिया गया है। पीठ ने मुंबई पुलिस आयुक्त को उन्हें सुरक्षा प्रदान करने के लिए भी निर्देश दिया है। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया है कि कार्रवाई के एक ही कारण पर उनके खिलाफ कोई और एफआईआर नहीं होनी चाहिए और टीटी एंटनी के मामले के आधार पर बाद में होने वाली एफआईआर को रद्द कर दिया।

क्या है आर्टिकल 19 :

अनुच्छेद 19 के अनुसार नागरिक को 6 प्रकार की स्वतंत्रतायें दी गई है –

  • अनुच्छेद 19(A) – भाषण और विचार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
  • अनुच्छेद 19(1) के अन्तर्गत प्रेस को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है । इसी के तहत देश के नागरिकों को राष्ट्रीय ध्वज को फहराने की स्वतंत्रता दी गई है !
  • संविधान के प्रथम संशोधन अधिनियम 1951 के द्वारा विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को सीमित कर दिया गया है।
  • सरकार राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक कानून व्यवस्था, सदाचार, न्यायालय की अवमानना, विदेशी राज्यों से संबंध तथा अपराध के लिए उत्तेजित करना आदि के आधार पर विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध लगा सकती है।
  • अनुच्छेद 19(B) के तहत शांतिपूर्ण तथा बिना हथियारों के नागरिकों को सम्मेलन करने और जुलूस निलने का अधिकार होगा । राज्यों की सार्वजनिक सुरक्षा एवं शान्ति व्यवस्था के हित में इस। स्वतंत्रता को सीमित किया जा सकता है।
  • अनुच्छेद 19(C) भारतीय नागरिकों को संघ या संगठन बनाने की स्वतंत्रता दी गई हैं ! लेकिन सैनिकों को ऐसी स्वतंत्रता नहीं दी गई है
  • अनुच्छेद 19(D) देश के किसी भी क्षेत्र मे स्वतंत्रता पूर्वक भ्रमण करने की स्वतंत्रता ।
  • अनुच्छेद 19(E) देश के किसी क्षेत्र में स्थाई निवास की स्वतंत्रता। (जम्मू कश्मीर को छोड़कर)
  • अनुच्छेद 19(G) कोई भी व्यापार या कारोबार करने की स्वतंत्रत

क्या है आर्टिकल 32 एवं 226 :

संविधान के अनुसार उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 32 अंतर्गत और उच्च न्यायालय को अनुच्छेद 226 के अन्तर्गत मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट निकलने की शक्ति प्रदान की गई है।

अनुच्छेद 32 तो संविधान के भवन की नींव का पत्थर है। इस अनुच्छेद पर टिप्पणी करते हुए डॉ• अम्बेडकर ने संविधान सभा में कहा था कि  “यदि मुझसे कहा जाये कि मैं संविधान के किस अनुच्छेद को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानता हूँ, ऐसा अनुच्छेद जिसके बिना संविधान व्यर्थ हो जायेगा तो मैं किसी और अनुच्छेद को नहीँ इसी को इंगित करूँगा। यह संविधान की आत्मा है, उसका हृदय है।”

अनुच्छेद 32 (1) :

  • यह समुचित कार्यवाहियों के माध्यम से मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिए उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रचलित करने के अधिकार की गारण्टी देता है। अर्थात उच्चतम न्यायालय में समस्त कार्यवाहियों या प्रक्रियाओं के माध्यम से नहीँ, अपितु केवल समुचित कार्यवाहियों या प्रक्रियाओं के माध्यम से लाया जा सकता है।
  • मूल अधिकारों के प्रवर्तन की शक्ति अत्यन्त व्यापक है।
  • उच्चतम न्यायालय इस उद्देश्य से कोई भी प्रक्रिया अपनाने के लिए स्वतंत्र है। वह बिना प्रतिवादी की उपस्थिति के भी सुनवाई कर सकता है।
  • इसी अधिकार का प्रयोग कर जस्टिस भगवती ने लोकहित वाद का प्रचलन किया।

अनुच्छेद 32 (2) :

समुचित कार्यवाही के बारे में बतलाता है। इस भाग द्वारा प्रदत्त अधिकारों को प्रवर्तित कराने के लिए उच्चतम न्यायालय को ऐसे निदेश या आदेश या रिट जिनके अंतर्गत बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, अधिकार-पृच्छा और उत्प्रेषण रिट हैं, जो भी समुचित हो, निकलने की शक्ति होगी।

अनुच्छेद 32 (3) :

 इसके अंतर्गत संसद विधि द्वारा किसी न्यायालय को उसकी स्थानीय सीमाओं के भीतर उच्चतम न्यायालय द्वारा खंड 2 के अधीन प्रयोग की जाने वाली किसी या सभी शक्तियों का प्रयोग करने के लिए सशक्त कर सकती है।

अनुच्छेद 32 (4) :

  • यह उपबन्धित करता है कि संविधान द्वारा अन्यथा उपबन्धित के सिवाय इस अनुच्छेद द्वारा गारण्टी किये गए अधिकारों को निलम्बित नहीँ किया जायेगा।
  • फर्टिलाइज़र कारपोरेशन, कामगार संघ बनाम  भारत संघ के वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अनुच्छेद 32 के अधीन उच्चतम न्यायालय की अधिकारिता संविधान का ‘आधारभूत ढांचा’ है। अतः इसे अनुच्छेद 368 के अधीन संशोधन करके नष्ट नहीं किया जा सकता।
  • इसी प्रकार एल• चंद्र कुमार बनाम  भारत संघ के वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने अपनी न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति को संविधान का आधरभूत ढांचा बताया था।

अनुच्छेद 32 के अन्तर्गत कौन आवेदन दे सकता है

  • परम्परागत रूप से रिट के माध्यम से कार्यवाही संचालित करने का अधिकार उसी व्यक्ति को है जिसके मूल अधिकार का हनन हुआ है। वह व्यक्ति न्यायालय में यह साबित कर देता है कि उसके मूल अधिकार का हनन हुआ है तो यह न्यायालय के लिए बाध्यकारी है कि वह उसे समुचित उपचार प्रदान करे।
  • परन्तु अब उच्चतम न्यायालय ने अब भिन्न दृष्टिकोण अपनाते हुए अनुच्छेद 32 में Locus standi के आधार को काफी व्यापक बना दिया है।
  • अब अनुच्छेद 32 के अधीन कोई संस्था या लोकहित से प्रेरित कोई नागरिक या व्यक्तियों का वर्ग किसी ऐसे व्यक्ति के संवैधानिक या विधिक अधिकारों के प्रवर्तन के लिए रिट फाइल कर सकता है।
  • जो निर्धनता या किसी अन्य कारण से रिट फाइल करने में सक्षम नहीँ है। ऐसा व्यक्ति या वर्ग अनुच्छेद 226 के अंतर्गत भी आवेदन कर सकता है अर्थात लोकहित वाद का अब हमारे यहाँ प्रचलित है
  • जिसका उदाहरण सेंटर फार पी• आई• एल• बनाम  भारत संघ के वाद में केंद्रीय सतर्कता आयुक्त के रूप में पी• जे• थॉमस की नियुक्ति का इस आधार पर विरोध किया गया कि उनके ऊपर भ्रष्टाचार निवारण की धारा 13 (1) व् धारा 120(b) भारतीय दण्ड संहिता के तहत मामला लम्बित था। न्यायालय ने उनकी नियुक्ति को अंस्थापित घोषित कर दिया तथा अभिखण्डित घोषित किया।
  • एस• पी• गुप्ता और अन्य बनाम  राष्ट्रपति और अन्य, 1982 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि न्यायाधीशों के स्थानांतरण के मामले में अधिवक्ता संघ को अनुच्छेद 32 के अधीन रिट अधिकारिता के द्वारा उनके स्थानान्तरण को चुनौती देने का हक प्राप्त है।
  • न्यायमूर्ति भगवती ने यहाँ तक कहा कि कोई व्यक्ति पत्र लिखकर भी उच्चतम न्यायालय से उपचार मांग सकता है।

क्या उच्चतम न्यायालय उपचार देने से मना कर सकता है ?

  • पूर्व न्याय :- मूल अधिकारों के प्रवर्तन के लिये कोई व्यक्ति अनुच्छेद 226 के अधीन उच्च न्यायालय में उपचार हेतु आवेदन करता है तो वहाँ असफल होने के बाद उसी विषयवस्तु को पुनः अनुच्छेद 32 के तहत उच्चतम न्यायालय में नहीँ उठा सकता।
  • उच्च न्यायालय में असफल होने के बाद कोई व्यक्ति अनुच्छेद 32 के अंतर्गत केवल अपील के माध्यम से ही उच्चतम न्यायालय जा सकता है।
  • दरयाव बनाम  उत्तर प्रदेश राज्य में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जहाँ बंदी प्रत्यक्षीकरण का मामला है वहाँ पूर्व न्याय का सिद्धान्त लागू नहीं होगा।

उपचारात्मक याचिका :

  • रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा, AIR 2002 के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने ऐतिहासिक फैसले में कहा कि अनुच्छेद 32 के अधीन अंतिम निर्णय को जिसको रिट द्वारा चुनौती नहीँ दी जा सकती है को भी वह गंभीर अन्याय के निवारण हेतु पुनर्विलोकन कर सकता है। यह ही उपचारात्मक याचिका है।

अनुच्छेद 32 के अपवाद :

  • अनुच्छेद 33 – संसद को यह शक्ति प्राप्त है कि इस भाग में दिए गए अधिकारों में से किसी को सशस्त्र बलों अथवा सार्वजनिक व्यवस्था बनाये रखने के लिए नियोजित बलों के सदस्यों के प्रयोग के सम्बन्ध में इस मात्रा तक निर्बन्धन लगाया जाये या निराकृत किया जाय कि वे अपने कर्तव्यों का उचित पालन कर सकें और उनमें अनुशासन बना रहे।
  • अनुच्छेद 34 – संसद को विधि द्वारा सेनाविधि के अधीन किये गए कार्यों को विधिमान्य बनाने की शक्ति प्राप्त है।

याचिका (रिट) और उनका विषय क्षेत्र :

एक रिट अथवा याचिका का अर्थ है – आदेश, यानि वह कुछ भी जिसे एक अधिकार के तहत जारी किया जाता है वह याचिका है, और इसे रिट के रूप में जाना जाता है। अनुच्छेद 32 और अनुच्छेद 226 के तहत भारतीय संविधान के तीसरे भाग में प्रदत्त मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए भारत का संविधान उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों को अधिकार प्रदान करता है।

याचिकायें (रिट) के पांच प्रकार की होती हैं –

  • बन्दी प्रत्यक्षीकरण
  • परमादेश
  • उत्प्रेषण
  • निषेधाज्ञा
  • अधिकार पृच्छा

पांच प्रकार की याचिकाओं (रिट) का वर्णन निम्नवत् है :

1- बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus) :

  • हेबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है कि “आपके पास शरीर होना चाहिए”।
  • रिट एक अदालत के समक्ष एक ऐसे आदमी को पेश करने के लिए जारी की जाती है जिसे हिरासत में या जेल में रखा गया है और हिरासत में लेने के 24 घंटे के भीतर उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया गया है और यदि यह पाया जाता है कि हिरासत में अवैध तरीके से रखा गया है तो कोर्ट ऐसे व्यक्ति को रिहा करा देती है।
  • रिट का उद्देश्य अपराधी को दंडित करने का नहीं होता लेकिन अवैध तरीके से हिरासत में लिए गये व्यक्ति को रिहा कराना होता है।
  • हालांकि, अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संरक्षण) को आपातकाल की घोषणा के दौरान भी निलंबित नहीं किया जा सकता है। इसलिए, बंदी प्रत्यक्षीकरण एक व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने के लिए एक बहुत ही मूल्यवान रिट बन जाती है।
  • सुप्रीम कोर्ट केवल मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के मामले में ही राज्य के खिलाफ बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट जारी कर सकता है जबकि उच्च न्यायालय अवैध रूप से या मनमाने ढंग से हिरासत में लिए गये किसी भी आम नागिरक के खिलाफ भी यह जारी कर सकता है।
  • बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट हिरासत में लिया गये व्यक्ति द्वारा स्वंय या उसकी ओर से कोई भी व्यक्ति दायर कर सकता है।
  • सुनील बत्रा बनाम दिल्ली प्रशासन का मामला : सुप्रीम कोर्ट के एक न्यायाधीश को एक अपराधी द्वारा एक पत्र लिखा गया था जिसे एक रिट को याचिका के रूप में लिया गया था। न्यायालय ने इस रिट को राज्य की दंडात्मक सुविधाओं की उपेक्षा के लिए नियोजित किया था। यह रिट तब जारी की गयी थी जब जेल के साथियों को कानूनी सहायता प्रदान करने और उनका साक्षात्कार करने के लिए कानून के छात्रों पर प्रतिबंध लगाया गया था।

2- परमादेश  (Mandamus) :

  • Mandamus (परमादेश) एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है “हमारा आदेश है।” यह कानूनी रूप से कार्य करने और गैर कानूनी कार्य के अंजाम से बचने के लिए, एक आदेश के रूप में एक न्यायिक उपाय है।
  • जहां A के पास कानूनी अधिकार होते हैं जो B पर कुछ कानूनी बाध्यताएं डालता है, B को अपने कानूनी कर्तव्यों का पालने करने के लिए A परमादेश रिट की मांग कर सकता है।
  • इस रिट को जारी करने का आदेश उच्चतम न्यायालय या उच्च न्यायालय द्वारा तब किया जाता है जब सरकार, अदालत, निगम या अधिकरण या लोक प्राधिकरण सार्वजनिक या वैधानिक कर्तव्य तो करते हैं लेकिन उन्हें निभा पाने में विफल रहते हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट एक व्यक्ति के मौलिक अधिकार को लागू करने के लिए एक परमादेश तब जारी कर सकता है जब कुछ सरकारी आदेशों या अधिनियमों पर इसका उल्लंघन करने का आरोप लगाये जाते हैं।
  • एक अधिकारी को अपने संवैधानिक और कानूनी शक्तियों का प्रयोग करने के लिए, कर्तव्यों का पालन नहीं करने पर संविधान द्वारा किसी भी व्यक्ति के लिए निर्धारित कर्तव्यों के निर्वहन करने हेतु मजबूर करने के लिए, अपनी अधिकारिता का प्रयोग करने के लिए और सरकार को किसी भी अंसवैधानिक कानून लागू नहीं करने के सरकारी आदेश की न्यायिक मजबूरी के लिए उच्च न्यायालय सीधे अथवा प्रत्यत्क्ष तरीके से रिट जारी कर सकते हैं।
  • भारत सरकार बनाम उन्नी कृष्णन मामले में यह कहा गया कि सहायता और संबद्धता के सवाल की परवाह किए बगैर एक निजी चिकित्सा/ इंजीनियरिंग कॉलेज अदालत की रिट क्षेत्राधिकार के भीतर आता है।

3- उत्प्रेषण (Certiorari) :

  • Certiorari (उत्प्रेषण) एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ ‘सूचित करने के लिए’ है। ‘उत्प्रेषण’ को एक न्यायिक आदेश के रूप में परिभाषित किया जा सकता है जो आचरण से संबंधित होता है और कानूनी कार्यवाही में उपयोग किया जाता है।
  • इसे निगम जैसे संवैधानिक और सांविधिक निकायों, कंपनियों और सहकारी समितियों जैसे निकायों और सहकारी समितियों तथा निजी निकायों तथा व्यक्तियों के खिलाफ जारी अदालत द्वारा प्रमाणित और कानून के अनुसार किसी भी कार्रवाई के रिकार्ड की आवश्यकता होती है।

ऐसे विभिन्न प्रकार के आधार हैं जिसके आधार पर उत्प्रेषण की रिट जारी की जाती है:

1) अधिकार क्षेत्र का अभाव

2) न्याय क्षेत्र का दुरूपयोग

3) अधिकार क्षेत्र का दुरुपयोग

4) समान न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन।

  • सैय्यद याकूब बनाम राधाकृष्णन मामले में, यह कहा गया कि उत्प्रेषक्ष की रिट जारी करना उच्च न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का एक पर्यवेक्षी क्षेत्राधिकार है और इस पर अदालती कार्यवाही एक अपीलीय अदालत के रूप में कार्य करने की पात्र नहीं है।
  • कानून की एक त्रुटि जो स्पष्ट रूप से द्स्तावेजों में अंकित है को तो रिट द्वारा सुधारा जा सकता है लेकिन तथ्य की त्रुटि को सहीं नहीं किया जा सकता है।
  • हालांकि, यदि एक तथ्य का निष्कर्ष ‘कोई सबूत नहीं है’ पर आधारित है तो इसे कानून की एक त्रुटि के रूप मे माना जाएगा जिसे उत्प्रेषण द्वारा ठीक किया जा सकता है

4- निषेधाज्ञा (Prohibition) :

  • निषेधाज्ञा का अर्थ है “मना करना या बंद करना” और आम बोलचाल में इसे ‘स्टे आर्डर’ के रूप में जाना जाता है।
  • जब कोई निचली अदालत या एक अर्ध न्यायिक निकाय एक विशेष मामले में अपने अधिकार क्षेत्र में प्रद्त्त अधिकारों को अतिक्रमित कर किसी भी मुक़दमें की सुनवाई करती है तो सुप्रीम कोर्ट या अन्य कोई भी उच्च न्यायालय द्वारा रिट जारी की जाती है।
  • भारत में, निषेधाज्ञा को मनमाने प्रशासनिक कार्यों से व्यक्ति की रक्षा के लिए जारी किया जाता है।

5- अधिकार पृच्छा (Quo warranto) :

  • Quo warranto एक लैटिन शब्द है जिसका अर्थ है “किस वारंट द्वारा” जब न्यायालय को लगता है कि कोई व्यक्ति ऐसे पद पर नियुक्त हो गया है जिसका वह हकदार नहीं है तब न्यायालय इस (अधिकार पृच्छा) को जारी कर सकता है और व्यक्ति को उस पद पर कार्य करने से रोक देता है।
  • संविधान द्वारा निर्मित कार्यालयों के खिलाफ इसे जारी किया जा सकता है जैसे- एडवोकेट जनरल, विधान सभा के अध्यक्ष, नगर निगम अधिनियम के तहत वाले अधिकारी, एक स्थानीय सरकारी बोर्ड के सदस्य, विश्वविद्यालय के अधिकारी और शिक्षक।
  • लेकिन इसे निजी स्कूलों की प्रंबंध समिति के खिलाफ जारी नहीं किया जाता है क्योंकि उनकी नियुक्ति किसी प्राधिकरण के तहत नहीं होती है।

निष्कर्ष :

संविधान के अंतर्गत बनाए गए कानूनों द्वारा सर्वोच्च तथा उच्च न्यायालयों की शक्तियों को सीमित नहीं किया जा सकता। न्यायालयों की शक्ति की समाप्ति अथवा उनमें न्यूनता केवल संविधान में संशोधन करने के पश्चात् ही की जा सकती है। अथवा संविधान की धारा 359 (1) के अनुसार राष्ट्रपति मूलभूत अधिकारों का न्यायालयों द्वारा प्रवर्तन स्थगित कर सकता है। सारांश यह कि युद्ध अथवा बाह्य आक्रमणकाल में या देश की अथवा देश के किसी भाग की सुरक्षा खतरे में डालनेवाले किसी गृहसंकट के समय मूलभूत अधिकारों का न्यायालय द्वारा प्रवर्तन स्थगित किया जा सकता है। पर ऐसे समय में भी उच्च न्यायालयों के अधिकार प्रवर्तन की शक्ति – मूलभूत अधिकारों के प्रवर्तन की शक्ति को छोड़कर – अक्षुण्ण रहती है।


मुख्य परीक्षा उत्तर लेखन अभ्यास हेतु प्रश्न (250 शब्द)

प्रश्न 1: भारतीय संविधान के आर्टिकल 32 को वर्तमान संदर्भ में विस्तारपूर्वक समझाइये।

प्रश्न 2: आर्टिकल 226 के अंतर्गत व्यक्ति को उच्च न्यायालय  में रिट दाखिल करने की असीमित शक्ति है। विश्लेषण करिए।  

प्रश्न 3: अधोलिखित दिए गए संवेधानिक याचिकाओं पर टिप्पणी कीजिए।

  • बन्दी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)
  • परमादेश (Mandamus)
  • उत्प्रेषण (Certiorari)
  • निषेधाज्ञा (Prohibition)
  • अधिकार पृच्छा (Quo Warranto)

 


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